National Journal of Advanced Research

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Vol. 3, Issue 2 (2017)

स्नातक स्तर पर शिक्षण के सन्दर्भ में सरकारी एवं निजी प्रबन्धतंत्र (प्राईवेट) महाविद्यालयों में अध्ययनरत विद्यार्थियों के मूल्यों एवं सामाजिक सफलता के मध्य सह-सम्बन्धों का तुलनात्मक अध्ययन


Bhanu Prakash, Dr. Girish Vats

अंग्रेजों ने भारतीय शिक्षा नीति को धार्मिक तथा मूल्य शिक्षा से बिलकुल अलग रखा, उन्होनें राज्य द्वारा संचालित विद्यालयों में इस शिक्षा को पूर्ण रूप से बंद करके धार्मिक तटस्थता की नीति का अनुसरण किया। स्वतन्त्र भारत में भी देश को धर्म निरपेक्ष धोषित कर दिया कि राज्यकोश से चलाई जाने वाली किसी भी संस्था में किसी प्रकार की धार्मिक शिक्षा नहीं दी जाएगी। परिवर्तन इस संसार का नियम है लेकिन जिस तरह से हमारे समाज में मूल्यों का ह्नास होता जा रहा है, वो सही नहीं है। प्राचीन काल में पाठशालाओं में धार्मिक और नैतिक शिक्षा पाठयक्रम का अभिन्न अंग थे।
मैकाइवर तथा पेज के अनुसार-“व्यक्ति तथा समाज का सम्बन्ध एक तरफ का सम्बन्ध नही है इनमें से किसी एक को समझने के लिए ही आवश्यक है।” अरस्तू के अनुसार ’’मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है इस बात का सरल अर्थ ये है कि मनुष्य अपने अस्तित्व और विकास के लिए समाज पर जितना निर्भर है, उतना और कोई प्राणी नहीं। मनुष्य में हम जो भी कुछ सामाजिक गुण देखते है वह समाज की ही देन है।“ एक व्यक्ति की प्राथमिक पाठशाला उसका अपना परिवार होता है और परिवार का एक अंग है जहाँ हमें सबसे पहले शिक्षा मिलती है। परिवार और समाज के अनुरूप ही एक व्यक्ति में सामाजिक गुणों तथा विशेषताओं का विकास होता है। आज हमारे समाज का स्वरूप तेजी से परिवर्तित हो रहा है, ये भी सही हैा
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